Poetic Genes
छोड़ दिया
रिश्तों के धागे
कुछ, अब भी जुड़े थे,
बीती रात, मैंने
उसे भी तोड़ दिया.
तुम्हारी ख़ुशी
कल भी चाहता था,
आज भी चाहता हूँ,
बस अपनी राहों को
अब तुमसे जुदा कर लिया.
जानता हूँ, तुम्हारी कोई गलती नहीं, पर
मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में होना
मुझ पर भी कोई
दायित्व नहीं.
तुमसे जो मिला,
उसका शुक्रिया.
बस अब और कुछ पाने का,
इरादा छोड़ दिया.
तुम्हारे दुःख से तो
अब भी दुखी होऊंगा
बस अपने दुःख की दास्ताँ
बतलाना छोड़ दिया.
दुआ है तुम,
हमेशा उन्नति करो,
बस अपनी उन्नति की वजह,
तुम्हे बनाना
छोड़ दिया.
दूर जाऊं या पास आऊं
tum bin
तुम बिन जैसे ये शाम
अधूरी ही रह गयी.
दिल में तो बस तुम थी
और तुम्हे पाने की हसरत
पर निगाहों से
दूर रह कर तुम अक्सर
यादों से भी ओझल हो गयी.
अक्सर तुम्हे सोचते-सोचते
जब मैं भूल जाता हूँ कि
कब तुम ज़हन में हो और कब
बस तुम्हारी एक धुंधली परछाई
तब यह शाम , जाने क्यों
और भी गहरी हो जाती है
और उस अँधेरे में
एक दिए कि लौ सा
बस तुम्हारा चेहरा
दूर कहीं झिलमिलाता
नज़र आता है.
ज़िन्दगी की रात से
डर कर जब भी ये मन
डरावने सपने देखता है
तब, तुम्हे खोने का डर
न जाने क्यों
उन सपनो में
हकीकत की
लकीरें खींच जाता है
दुनिया की भीड़ में, कल तक
जितने भी चेहरे थे
आज उन सभी चेहरों में
बस तुम्हारा ही
अक्स नज़र आता है
तुम से ये दूरी जो अब तक बनी है
वो दूरी हर शाम
न जाने क्यों
डरावनी आकृतियाँ
बन जाती है
और तुम्हे पाने के लिए
वक़्त ने जो वक़्त
निर्धारित किये हैं
वो हर शाम के साथ
बस छोटी हो जाती है.
दीवार
कल जैसे
सब कुछ ठीक था
आज, न जाने क्यों
सब, बदला-बदला सा है.
कल तक जहाँ न थी, बंदिशें
आज न जाने क्यों
सब कुछ सहमा-सहमा सा है.
कल तक जो थी, गलियाँ
भरी और छलकती
स्नेह और प्यार से
आज न जाने क्यों,
भरी हैं,
खामोशियों और खार से
और कभी
इन्हीं गलियों में
खोई थी, बंदिशें सारी
पर अब न जाने क्यों
जुड़ गयीं हैं, चंद इटें
नफरत की दीवार से, और
खिंची गयी है एक रेखा
लहू की एक धार से.
कल तक सब कुछ हमारा था
आज, न जाने क्यों,
ये मेरा वो तुम्हारा है,
और शायद
हवाओं का भी
एक बंटवारा है.
जाने क्यों,
आज, वो किलकारियां
अधरों पे बिखड़ी
एक मुट्ठी मुस्कान
दब गयी है,
घृणा की इन्हीं
मजबूत दीवारों के तले.
इन्ही साँसों ने तो
कल महसूस किया था
प्यार की अप्रतिम
सुगंध को.
इसी मन ने तो
कल महसूस की थी
रिश्तों की खुली धूप को
पर, आज क्या क्या हुआ कि
हर सुगंध, जैसे
कभी न मिटने वाली
दुर्गन्ध है.
खुली धूप, जैसे
बस दीवारों की
परछाई है.
आज न जाने क्यों,
वो गलियां
काफी संकरी हो गयी है,
और सब कुछ
बदला-बदला सा है,
पर ये मन, अब भी
न जाने क्यों,
भटकता है,
इन्हीं संकरी
गलियों के बीच
एक आशा लिए, कि
शायद ये दीवारें
कल गिरेंगी,
रिश्तों की धूप,
भावनाओं कि महक
फिर से मेरे
आँगन में फैलेगी
और जिन परछाइयों के तले
जीता था, मैं कल तक
वो ज़िन्दगी की कड़ी धूप में
मेरे लिए, उम्र भर
एक छाया बनेगी.



